भारत साधू संतो की भूमि मानी जाती है इसीलिए इसे देवभूमि और भी नामों से जाना जाता है . भारत में महान साधू संत हुए हैं बाबा  पवहारी भी  एक  ऐसे ही संत थे। उनके बारे में कहा जाता है उनकी उम्र 100 वर्ष से भी अधिक थी। उन्होंने ही स्वामी विवेकानन्द को भी मार्गदर्शन देकर रामकृष्ण परमहंस की कृपा पाने का रास्ता बताया था। कभी भी किसी ने भी उन्हें कुछ खाते-पीते नहीं देखा था इसी वजह से उनका नाम पयोहारी (बिना अन्न-जल खाए, केवल वायु के आहार पर भी जीवित रहने वाला) पड़ गया।

बाबा पवहारी का जीवन

बाबा पवहारी

बाबा पवहारी के जन्म के बारे में कुछ भी निश्चित नहीं है। वह वाराणसी के एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। प्राथमिक शिक्षा गाजीपुर में पढ़ने के बाद वह गिरनार पर्वत स्थित काठियावाड चले गए जहां

उन्होंने विधिवत योग की दीक्षा ली और सन्यांस ले लिया। इसके बाद उन्होंने समाज तथा देश के कल्याण के लिए कार्य किया।

बाबा पवहारी के चमत्कार

वर्ष 1890 में बाबा पवहारी की स्वामी विवेकानंद से मुलाकात हुई थी। कहा जाता है कि उन्होंने ही स्वामी विवेकानन्द को रामकृष्ण परमहंस से मिलने तथा उनका शिष्यत्व स्वीकारने के लिए मानसिक प्रेरणा दी थी। वह अपने जीवन में काफी दयालु और नम्र थे।

एक बार एक कुत्ता उनके हाथ से रोटी लेकर भाग गया। वो तुरंत ही उस कुत्ते के पीछे हाथ जोड़कर रूकने की प्रार्थना करते हुए दौड़े। वो कह रहे थे कि महाराज मुझे रोटी पर घी तो लगा लेने दो, फिर खा लेना।

इसी तरह एक रात एक चोर उनकी झौंपड़ी में घुस आया। वह जैसे ही उनका सामान उठा कर जाने लगा, बाबा की आंखें खुल गई। उन्होंने तुरंत ही चोर के आगे हाथ जोड़ दिए और कहा, भगवन ये सब आपका ही है, आप इसे स्वीकार करें। इतना सुनते ही चोर का सिर शर्म से झुक गया। उसने चोरी करना छोड़ बाबा का शिष्यत्व ग्रहण कर लिया और बाद में खुद भी एक संत बन गया।

बाबा पवहारी का अंतिम प्रयाण

इसी तरह एक बार एक कोबरा सांप ने पयोहारी बाबा को काट लिया। जहर के असर से वह तुरंत ही बेहोश हो गए। काफी देर बाद होश में आने पर जब उनके साथियों ने पूछा तो उन्होंने कहा, कि यह भगवान का संदेश था। इस घटना के बाद वह अपनी झौंपड़ी में चले गए। वहां कुछ दिनों तक अंदर ही रहे और अंत में एक दिन उनकी झौंपड़ी से आग लग गई। उसके बाद बाबा को कभी दुबारा नही देखा गया।