ब्लॉग : बापू नहीं साहब गाँधी चाहिए

वो बड़े आराम से कह कर चला गया कि ”बापू नहीं साहब गाँधी चाहिए’‘ .  मुझे बापू ने कुछ नहीं दिया और न ही वो कुछ दे सकता है . उसने हमेशा मुझे रोका है जब भी कहीं कदम रखने की कोशिश की वहां मुझे बापू ने रोका है पर गाँधी ने हर वक़्त साथ दिया . उसके मुंह से ये लफ्ज़ सुनकर मैं कुछ पल के लिए अवाक रह गया कि उससे क्या कहूँ . इतने समझदार तो आप भी हैं कि बापू से आशय उसका क्या था और गाँधी से क्या ?

अगर ये वाक्य किसी लेख़क , कवि , पत्रकार के होते तो शायद हमारे लिए ये आम होता पर एक आमजन के इन शब्दों ने मुझे झकझोर दिया . आज बापू से ज्यादा मजबूत गाँधी है जो आपको कहीं नहीं रोकता है . बापू की आज समाज में कितनी प्रासंगिता है ये सब जानते हैं पर सब अजनबी बने हुए है .

बापू के पास सत्य , अहिंसा , सादगी और जितने भी शिष्टाचार के बचे हुए शब्द हैं वो सब हैं पर गाँधी के पास शक्ति और मोह है जिससे वो किसी भी चीज़ को आकर्षित करने का बल रखती है . बापू को गाँधी बुढा और पुरानी विचारधारा समझता है .

बापू मात्र सत्य , अहिंसा , सादगी की मूर्त है जबकि गाँधी महत्वाकांक्षाओं से बनी मुद्रा है जिसके आभाव में आज जीवन बड़ा ही मुश्किल है . गाँधी के मायने में पैसा ही समाज है और बापू के मायने में स्वच्छ मानसिकता से जन्मा परिवेश समाज है .

उस शख्स के एक वाक्य ने मुझे अपनी जगह को भरने का मौका दिया और सोचने वाला विषय है कि सिर्फ सियासत और बड़बोलेपन के लिए बापू का नाम लिया जा रहा है वरना उनके  सिद्धांतों के विपरीत जाकर की कृत्य किये जा रहे हैं . आज बापू की शिक्षा की प्रासंगिता समाज को भले ही है पर उसकी पराकाष्ठा क्या है ?

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Rajdeep Raghuwanshi

नमस्ते , मैं एक प्रोफेशनल ब्लॉगर हूँ और मुझे एंटरटेनमेंट, लाइफस्टाइल और ह्यूमर पर लिखना पसंद है !

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