हमारा IRNSS-1H देगा अमेरिकन GPS को टक्कर , आज इसरो करेगा प्रक्षेपित

ISRO यानि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन आज एकबार फिर इतिहास रचने जा रहा है. ISRO आज अपना आठवां नैविगेशन सैटेलाइट सिस्टम IRNSS-1H का प्रक्षेपण करने वाला है.

चेन्नई से करीब 80 किलोमीटर दूर श्रीहरिकोटा रॉकेट केंद्र पर बुधवार की दोपहर दो बजे प्रक्षेपण की 29 घंटों की उल्टी गिनती शुरु हो चुकी है और गुरुवार शाम लगभग सात बजे छोड़ा जाएगा.

अमरीका के GPS को देगा टक्कर

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यह आठवां IRNSS उपग्रह होगा और इसका प्रक्षेपण IRNSS-1A के स्थान पर किया जा रहा है, क्योंकि IRNSS-1A की रूबीडियम परमाणु घड़ियां खराब हो रही हैं और सटीक स्थिति डेटा प्रदान करने के लिए परमाणु घड़ियां जरूरी होती हैं। सरल शब्दों में कहें तो IRNSS या नाविक (नेविगेशन विद इंडियन कांस्टेलेशन) अमरीका के स्वामित्व वाले जीपीएस के समान है।

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1,425 किलो है वजह

इसरो के अधिकारी के मुताबिक कि भारतीय क्षेत्रीय नैविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS) के हिस्से, 1,425 किलोग्राम वजनी उपग्रह को ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान ( PSLV-C39) का रॉकेट एक्सएल अंतरिक्ष में लेकर जाएगा।

1,420 करोड़ की लागत से बना IRNSS-1H 

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1,420 करोड़ रुपये लागत वाला भारतीय नैविगेशन सैटेलाइट सिस्टम में नौ उपग्रह शामिल हैं, जिसमें सात कक्षा में और दो विकल्प के रूप में हैं। एक विकल्प में IRNSS-1H है। इसका नौवहन पेलोड उपयोगकर्ताओं को नौवहन सर्विस सिग्नल प्रेषित करेगा। यह पेलोड एल 5-बैंड और एस-बैंड पर काम करेगा। IRNSS-1H पेलोड में एक सी-बैंड ट्रांसपोंडर भी शामिल है, जो उपग्रह की सीमा के सटीक निर्धारण की सुविधा देता है। आईआरएनएसएस-1एच लेजर रेंजिंग के लिए कॉर्नर क्यूब रेट्रो रिफ्लेक्टर भी लेकर जा रहा है।

समुद्री मछुआरों के लिए होगा फायदेमंद

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इसरो के मुताबिक, नाविक मछुआरों को मछली पकड़ने के लिए संभावित क्षेत्र में पहुंचने में मददगार साबित होगा। वह मछुआरों को खराब मौसम, ऊंची लहरों और अंतर्राष्ट्रीय समुद्री सीमा के पास पहुंच पहुंचने से पहले सतर्क होने का संदेश देगा। यह सेवा स्मार्टफोन पर एक सॉफ्टवेयर एप्लीकेशन के द्वारा उपलब्ध होगी।

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Rajdeep Raghuwanshi

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