कबीर के इस दोहे से समझें सफलता का राज़ …..

मेहनत और सफलता एक दूसरे के पूरक हैं पर कभी-कभी कोई काम हमारा पूरा ही नहीं होता है और लगता है कि हम इस काम में सफल हो ही जाएंगे, लेकिन ऐनवक़्त पर असफल हाथ लग जाती है. कबीर के इस दोहे से समझें सफलता का राज़  .

संत कबीर दस ने कहा है कि ,

पकी खेती देखिके,गरब किया किसान।
अजहूं झोला बहुत है,घर आवै तब जान।
दोहे का अर्थ समझें ,
इन पंक्तियों में ‘अजहूं झोला’ शब्द आया है, इसमें झोला का अर्थ है झमेला यानी परेशानी। किसान की फसल पक चुकी है और वह बहुत प्रसन्न है। यहीं से उसे खुद पर गरब यानी गर्व हो जाता है, लेकिन फसल काटकर घर ले जाने तक बहुत सारे झमेले होते हैं। फसल काटकर खेत में रखी है और उस दौरान बारिश हो जाए तो सब चौपट हो जाता है। जब तक फसल घर न आ जाए, तब तक सफलता नहीं माननी चाहिए। इसीलिए कहा है – ‘घर आवै तब जान।’

यही बात हमारे कार्यों पर भी लागू होती है। कोई भी काम करें, जब तक अंजाम तक न पहुंच जाएं, यह बिल्कुल नहीं मानना चाहिए कि हम सफल हो चुके हैं। बाधाएं कई प्रकार की होती हैं और वे कभी भी आ सकती है। अभिमान यानी गर्व और लापरवाही भी बाधाएं ही हैं। हमें अभिमान और लापरवाही से बचते हुए कार्य करना चाहिए। तभी अंत में सफलत मिल सकती है।

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Rajdeep Raghuwanshi

नमस्ते , मैं एक प्रोफेशनल ब्लॉगर हूँ और मुझे एंटरटेनमेंट, लाइफस्टाइल और ह्यूमर पर लिखना पसंद है !

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