अल्टीमेटम के 24 घंटे भी इंतज़ार नहीं कर पाया निगम, छीन ली सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी

इंदौर : मध्‍यप्रदेश की व्‍यावसायिक राजधानी इंदौर के रणजीत हनुमान मंदिर के बना मनी सेंटर निर्माण से लेकर अब तक विवादों के घेरे में था पर नगर निगम ने कारोबारियों को 24 घंटे का अल्टीमेटम देकर इसे तोड़ दिया गया है. इसी के साथ निगम और इंदौर विकास प्राधिकर पर कई तरह के प्रश्न खड़े हो गए हैं. दशहरा जैसे पर्व पर एक दम मनी सेंटर की ईमारत को ध्वस्त करने का निगम और IDA फैसला अब व्यापारियों को रास नहीं आ रहा है

सिर्फ़ हॉस्पिटल के नक़्शे पर बनी इसी इमारत पर लीज उल्लंघन था जिसकी इतनी बड़ी सजा निगम और IDA द्वारा दी है. बता दें कि 1 अक्टूबर को ही राज्य सरकार ने नया नियम बनाया था इसका गज़ट नोटिफिकेशन जारी भी हुआ है कि लीज उल्लंघन के मामलों को प्राधिकरण पेनेल्टी ले कर क्लीन चिट दी जाएगी ,उस नियम के आधार पर बिल्डिंग का लैंड यूज़ चेंज किया जा सकता था पर इसके बावजूद भी निगम एवं IDA ने जानबूझकर इसको नज़रअंदाज़ किया है. 18 साल पुराने मनी सेंटर को ध्वस्त पर जहाँ निगम और IDA विवादों के घेरे में फंस गए हैं. तो वहीं इस पर लोकायुक्त जाँच करेगा ?

इंदौर विकास प्राधिकरण व निगम पर आरोप आरोप है कि उन्होंने हाई कोर्ट के आदेश को आनफान में सही तरीके से न पढ़कर यह बड़ा कदम उठाया है. नगर निगम ने तो अल्टीमेटम देकर 24 घंटे इंतज़ार भी नहीं किया. वहीं IDA ने भी लीज शर्तों का उल्लंघन किया है. दशहरा महापर्व के मौके 54 दुकानदारों के साथ हुए अन्याय पर निगम और विकास प्राधिकरण जिम्मेदार हैं.

बता दें नगर निगम और जिला प्रशासन की टीम ने रविवार सुबह मनी सेंटर को जमींदोज कर दिया. इसे तोड़ने के लिए 6 पोकलेन, 2 जेसीबी और 150 से भी अधिक निगम कर्मचारी अधिकारियों के अलावा तीन थानों के टीआई, सीएसपी समेत बड़ी संख्या में पुलिस बल मौजूद रहा.

कारोबारियों व दुकानदारों के निगम व IDA से प्रश्न यही हैं कि जब भूमि स्वीकृत हुई थी तब क्या दोनों सो रहे थे. अगर मनी सेंटर लीज उल्लंघन के दायरे में आ रहा है तो निगम द्वारा अल्टीमेटम दिए जाने के बाद उसे 24 घंटे का सब्र क्यों नहीं हुआ ? 5-6 बार मनी सेण्टर की नपती के बाद भी नगर निगम क्यों कोई अवैध निर्माण नहीं ढूंढ पाई ?

प्रश्न महापौर मालिनी गौड़ पर खड़े हुए ही कि अवैध निर्माण का अल्टीमेटम देकर 24 घंटे के भीतर इमारत को ध्वस्त कर देना राष्ट्रहित में था या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा थी ? भरे त्यौहार के मौके पर यह फैसला लेना कितना जनहित में था क्या यह निर्णय दीवाली के बाद नहीं लिया जा सकता है ? क्या कारोबारियों और दुकानदारों को 24 घंटे की वजह 24 दिन का अल्टीमेटम नहीं दिया जा सकता है ? इन व्यापारियो और दुकानदारों रोज़ी रोटी छीन ली उसका हर्जाना कौन देगा, कब देगा ? यह प्रश्न उन सैकड़ों परिवारों का है इनकी एक दिन में दुनिया ही तबाह हो गयी.

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Rajdeep Raghuwanshi

नमस्ते , मैं एक प्रोफेशनल ब्लॉगर हूँ और मुझे एंटरटेनमेंट, लाइफस्टाइल और ह्यूमर पर लिखना पसंद है !

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